भारतीय ज्ञान परंपरा मे वैज्ञानिकता एवं समरसता का अध्ययन
डॉ. शुभम वर्मा
प्रस्तावना:
भारतीय शिक्षा व्यवस्था के विषय मे कई महत्वपूर्ण लोगों ने अलग अलग विचार दिये हैं | इसका कारण यह है की भारत एक विविध देश रहा है तथा यहाँ शिक्षा को लेकर कभी भी संकीर्ण मानसिकता नहीं रही थी | स्वतन्त्रता के पश्चात भी दो तरह के विचार शिक्षा को लेकर पनपे – पहला जो कहता था की भारत एक प्राचीन राष्ट्र था तथा इसकी प्राचीन गुरुकुल शिक्षा पद्दती श्रेष्ठ हुआ करती थी, दूसरा की पहले भारत मे कुछ भी अच्छा नहीं था इसे जो दिया अंग्रेजों ने दिया तथा टीबी मैकाले की शिक्षा पद्धति श्रेष्ठ है | हम सभी जानते हैं की स्वतन्त्रता के पश्चात मैकाले की शिक्षा पद्धति को ही कुछ सामान्य बदलावों के साथ भारत मे लागू कर दिया गया | यही नहीं जिन लोगों ने भारत की प्राचीन शिक्षा पद्दती की वकालत करी उन्हे यह तर्क देकर शांत करवा दिया गया या बेइज़्ज़त किया गया की भारत की शिक्षा व्यवस्था वैज्ञानिक नहीं थी, इसमे शूद्रों के साथ भेदभाव होता था इत्यादि |
जब भारतीयों ने अपने दस्तावेजों के आधार पर इन बातों का खंडन किया तो उन्हे कहा गया की – आप भारत के हो ,इसलिए भारत की बढ़ाई करोगे ही, अतः आपके साक्ष्य अमान्य हैं | बाद मे जब अंग्रेजों के स्वयं के दस्तावेज़ सामने आए तो उसमे गुरुकुल एवं उसमे पढ़ने वाले छात्रों की संख्या सामने आई तो परिपेक्ष्य कुछ बदलता सा नज़र आया | यही नहीं जब भारतीय ग्रन्थों का अध्ययन किया गया तो उनमे भी आज के विज्ञान से जुड़ी अद्भुत जानकारियाँ सामने आने लगीं | धर्मपाल जी ने अपनी पुस्तक ‘रमणीय वृक्ष’ मे अंग्रेजों के ही दस्तावेजों का अध्ययन करके अद्भुत जानकारी दुनिया के सामने रखी | इस शोधपत्र मे इन्ही सब तर्कों का अध्ययन एवं विश्लेषण किया जा रहा है की भारतीय प्राचीन शिक्षा व्यवस्था कितनी वैज्ञानिक एवं समावेशी थी |
शोध प्रश्न:
- क्या भारत की शिक्षा व्यवस्था वैज्ञानिक थी ?
- क्या भारत की शिक्षा व्यवस्था मे शूद्रों के साथ भेदभाव होता था ?
प्राचीन भारतीय शिक्षा और विज्ञान –
अधिकतर व्यक्तियों के मन मे शिक्षा शब्द सुनते ही सर्वप्रथम पश्चिमी शिक्षा के चित्र घूमने लगते हैं; बहुत से लोगों का यह सोचना कि भारत मे सिर्फ धर्म, पूजा-पाठ, ध्यान, योग इत्यादि ही होता था तथा विज्ञान तो पश्चिम से आया है | इस धारणा का अवलोकन आवश्यक है, क्योंकि प्राचीन भारत मे अगस्त्य मुनि, कनाड मुनि, ऋषि भारद्वाज से लेकर वराहमिहिर, राजा भोज तथा शिवकर बपुजी तलपड़े तक विज्ञान की एक अद्भुत एवं अविस्मरणीय परंपरा रही है । किन्तु ना सिर्फ, कुछ विदेशी आक्रांताओं के हमलों तथा विश्वविध्यालयों एवं पुस्तकों के विनाश कर देने के कारण बहुत सा ज्ञान एवं विज्ञान लुप्त हुआ है; बल्कि बहुत ही संगठित एवं प्रायोजित तरह से हमारे भारतीय ज्ञान तथा गुरुकुल शिक्षा को मुगलों और अंग्रेजों के समय जानबूझकर नष्ट किया गया है; ताकि दुनिया कि सबसे प्राचीन तथा सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को नष्ट किया जा सके । यह बहुत ही दुखद है कि आज़ादी के बाद भी कुछ इतिहासकारों ने भारत के एक बड़े वर्ग को देश के सही इतिहास से वंचित रखा तथा पुस्तकों एवं पाठ्यक्रम मे हमारे इतिहास के साथ साथ हमारे ज्ञान विज्ञान का वर्णन भी छिपा दिया गया । इससे देश के युवाओं के भीतर एक हीन भावना घर कर गयी कि इस देश मे तो कुछ था ही नहीं; तथा जो भी है वह पश्चिम मे है । इसके कारण देश के कई युवाओं तथा प्रतिभाओं का पलायन भी देश से बाहर हो गया तथा उनकी प्रतिभाओं एवं ऊर्जा का उपयोग पश्चिमी देशों ने स्वयं के विकास के लिए किया ।
- प्राचीन वैदिक काल एवं मौर्य काल तथा गुप्त काल इत्यादि तक दक्षिण से लेकर उत्तर तक भारत मे कई गुरुकुल एवं गुरु शिष्य परम्परा से चलने वाले विध्यालय हुआ करते थे | यहाँ तक की बहुत से विध्यालय और गुरुकुल अंग्रेजों के समय तक जीवित रहे | प्रो. धरमपाल अपनी पुस्तक ‘द ब्यूटीफूल ट्री’ मे लिखते है की –
“अंग्रेजों के भारत आगमन के पूर्व भारत शिक्षा, कृषि, हस्तशिल्प आदि अनेक क्षेत्रों में अग्रणी था, किन्तु अंग्रेजों ने योजनापूर्वक भारत की संपत्ति का शोषण करने के लिए इसे पददलित किया | 1835 में बिलियम एडम ने बंगाल और बिहार के गाँवों में शिक्षा की स्थिति को लेकर एक सर्वेक्षण किया था | उसने अपने प्रथम विवरण में लिखा था कि 1830 से 1840 के वर्षों में बंगाल और बिहार के गांवों में एक लाख के लगभग पाठशालाएं थीं | चेन्नई प्रदेश के लिए भी ऐसा ही अभिमत टॉमस मनरो ने व्यक्त किया था | उसके अनुसार “वहां प्रत्येक गाँव में एक पाठशाला थी” | इसी प्रकार मुम्बई प्रेसीडेंसी के जी.एल.प्रेंटरगास्ट नामक वरिष्ठ अधिकारी ने लिखा कि “गाँव बड़ा हो या छोटा, यहाँ शायद ही कोई ऐसा गाँव होगा, जिसमें कम से कम एक पाठशाला न हो | बड़े गाँवों में तो एक से अधिक पाठशालाएं भी थीं |”
इन आंकड़ों से यह सिद्ध होता है की प्राचीन भारत मे गुरुकुलों के माध्यम से गाँव गाँव तक शिक्षा दी जा रही थी, मगर आज भी अधिकतर आधुनिक लोगों का मत है की भारतीय पाठशालाओं मे प्राचीन काल मे शायद सिर्फ धार्मिक विषय ही पढ़ाये जाते रहे होंगे तथा विज्ञान एवं अन्य विषय अंग्रेज़ भारत मे लाये हैं | किन्तु ऐसा नहीं है, इस शोधपत्र मे हम आगे पुस्तकों तथा उनके लेखकों के नामो के साथ इस तथ्य की समीक्षा करते हैं की कैसे अलग अलग वैज्ञानिक विषय भारतीय शिक्षा परंपरा मे पढ़ाये जाते रहे हैं | यदि सिर्फ संस्कृत भाषा की ही बात करें तो भी इतने विशिष्ट विषय भारत मे हुआ करते थे | आज के समय मे बहुत से लोगों को यह लगता है कि संस्कृत मे तो सिर्फ देवी देवताओं कि स्तुतियाँ एवं मंत्र इत्यादि ही थे; तथा और कोई साहित्य संस्कृत के भीतर नहीं था । अतः कुछ उदाहरणो के साथ हम जानेगे कि प्राचीन भारत मे संस्कृत के भीतर किस किस तरह का साहित्य उपलब्ध था –
- ऋषि भारद्वाज कि एक पुस्तक है “वैमानिका शास्त्र” इस पुस्तक के भीतर विमान बनाने के कई तरीकों का वर्णन प्राचीन समय मे किया गया था । [1]ऐसा माना जाता है कि इसी पुस्तक को आधार बनाकर मुंबई मे श्री शिवकर बपुजी तलपड़े ने १८९५ मे एक चालक रहित विमान बनाकर उसे समुद्र के किनारे कई लोगों के समक्ष उड़ाकर दिखाया था । इस उपक्रम के लिए उनकी वित्तीय सहायता गुजरात मे वडोदरा के महाराज गायकवाड ने की थी । इसके कई वर्षों बाद “राइट ब्रदर्स” ने अमेरिका मे विमान उड़ाकर दिखाया तथा आज उनके नाम के आगे विमान के आविष्कारक का नाम आता है किन्तु अफसोस कि बात है कि शिवकर बापुजी तलपड़े जी का नाम बहुत ही कम लोग जानते हैं । “ वैमानिका शास्त्र “ पर आज भी दुनिया के कई देशों मे शोध कार्य चल रहे हैं ।
- इसके अलावा संस्कृत साहित्य का बाकी क्षेत्रों मे भी योगदान अद्भुत है जैसे भरत मुनि का “नाट्य शास्त्र”– नाटक, कला, अभिनय एवं संगीत का महान ग्रंथ है ।[2] ऐसे ही “माया माता” वास्तुकला के ऊपर एक प्राचीन पुस्तक है । चाणक्य/ कौटिल्य का “अर्थशास्त्र” जहाँ राजनैतिक विज्ञान, न्याय एवं वित्तीय प्रबंधन के अद्भुत गुण सिखाता है तो वहीं पाणिनी की “अष्टाध्यायी” दुनिया कि भाषा विज्ञान से संबन्धित पहली पुस्तक है जिसमे प्राचीन संस्कृत कि व्याकरण को समझाया गया है । इसी तरह छंद तथा श्लोक पढ़ने और गाने के विषय मे सीखने के लिए जहाँ भारत मे “पिंगल छंद शास्त्र” लिखा गया है वहीं ऋषि गौतम के “न्याय शस्त्र” मे तर्क इत्यादि के विषय मे बहुत विस्तार से बताया गया है ।
- “चरक संहिता” नामक पुस्तक मे जहाँ आयुर्वेद एवं शरीर के विज्ञान कि बात कही गयी है वहीं वात्सायन कि “कामसूत्र” मे काम शास्त्र, चित्रकला इत्यादि का वर्णन है । इसी तरह वराहमिहिर ने खगोलशास्त्र के अद्भुत नियमों के विषय मे प्राचीन समय मे बहुत विस्तार से लिखा है । खिलजी के “नालंदा विश्वविध्यालय” के पुस्तकालय को नष्ट कर देने एवं असंख्य प्राकृतिक आपदाओं तथा विदेशी आक्रमणों को झेलते हुए आज भी लाखों संस्कृत पाण्डुलिपियाँ विद्यमान हैं। निःसंदेह ही यह सम्पदा छापाखाने के आविष्कार के पहले किसी भी संस्कृति द्वारा सृजित सबसे बड़ी सांस्कृतिक विरासत है।
अब हम बात करते हैं प्राचीन भारतीय विज्ञान के ऐसे उदाहरणो कि जिसे आज का विज्ञान भी उतनी ही मान्यता देता है जितनी कि वो पश्चिमी विज्ञान को देता है । कई लोगो को लगता है कि बहुत से विषय 19वी या 20वी शताब्दी मे दुनिया मे विकसित हुये हैं जबकि प्राचीन भारत मे यह विषय पहले से ही चले आ रहे थे । आइये ऐसे ही कुछ विषयों के उदाहरण लेते हैं –
- शल्य-चिकित्सा – प्राचीन काल मे आचार्य सुश्रुत ने “सुश्रुत संहिता” नमक पुस्तक लिखी है जिसमे उन्होने शल्य चिकित्सा के विषय मे विस्तार से वर्णन किया है । इस पुस्तक मे उन्होने पेट से लेकर नाक तक कि शल्य चिकित्सा के विषय मे बताया है तथा शल्य चिकित्सा करने के औजारो एवं उपकरणो के विषय मे भी विस्तृत वर्णन इस पुस्तक मे है । आज सारी दुनिया मे सर्जरी विषय पढ़ाते समय आचारी सुश्रुत का नाम लिया जाता है तथा शल्य चिकित्सा कि कई पुस्तकों मे उनके नाम कि चर्चा हुई है ।[3]
- गणित – वैसे तो गणित के ऊपर भारत मे कई विद्वानो ने कार्य किया है जैसे आर्यभट्ट, भास्कराचार्य प्रथम इत्यादि मगर भास्कर द्वितीय (1114-1185) ने गणित के विषय मे सराहनीय कार्य किया है । इन्होने “सिद्धान्त शिरोमणि” नामक ग्रंथ लिखा है जिसमे लीलावती , बीजगणित , ग्रहगणित तथा गोलाध्याय नमक चार भाग हैं । इनमे अंकगणित, बीजगणित, ग्रहों कि गति से संबन्धित गणित तथा गोले से संबन्धित गणित के विषय मे समझाया गया है । यही नहीं न्यूटन से कई वर्ष पहले इन्होने ‘गुरुत्वाकर्षण’ के विषय मे भी अपनी पुस्तक “सिद्धान्त शिरोमणि” मे वर्णन किया है ।[4]
- अणु सिद्धान्त – छठी शताब्दी मे भारत मे एक ऋषि हुये ‘कणाद’ । इन्होने भारत को ‘वैशेषिका-दर्शन’ दिया । कणाद ने अपनी पुस्तकों मे भौतिक शास्त्र के कई सिद्धांतो के विषय मे लिखा है तथा उनमे से सबसे महत्वपूर्ण अणु / परमाणु सिद्धान्त (एटम थ्योरी) के विषय मे भी इनकी पुस्तकों मे विस्तार से लिखा गया है ।
- बोधायन सुलभसूत्र – इस पुस्तक मे ऋषि बोधायन ने पाई का मान तथा बोधायन प्रमेय के विषय मे वर्णन किया है । इन्होने यह दोनों ही चीजें पाइथोगोरस के पैदा होने के कई वर्षों पूर्व ही खोज ली थीं । लेकिन दुर्भाग्यवश भारत मे कई वर्षों तक पाइथोगोरस तो पढ़ाया जाता रहा मगर बोधायन और सुलभसूत्र छात्रों से छीन लिए गए ।
- नौका विज्ञान – राजा भोज की पुस्तक “युक्तिकल्पतरु” मे राजा भोज नौका विज्ञान ,नौका पर चुंबकीय प्रभाव इत्यादि के बारे मे बताते हैं । इसमे नौका या जहाज कैसे बनाना चाहिए तथा उन्हे किस तरह से पानी, जंग इत्यादि से बचाया जा सकता है इन सभी विषयों पर राजा भोज ने विस्तृत वर्णन इस पुस्तक मे किया है ।[5]
इसी तरह अगस्त्य संहिता मे “विद्युत निर्माण” के विषय मे वर्णन है तो ‘अष्टाध्यायी’ मे पाणिनी ने व्याकरण के विषय मे बहुत से सूत्र लिखे हैं ।[6] भारत मे ऐसे सैंकड़ों उदाहरण प्राचीन भारतीय विज्ञान के भरे पढे हैं, यह भी वह पुस्तकें और पांडुलिपियाँ हैं जो इतने विदेशी आक्रांताओं के हमलों के बाद भी सुरक्षित बच गयी हैं | यह सिद्ध करता है की जब भारत मे सभी पुस्तकें उपलब्ध होती रही होंगी , उस समय भारत या भारत का विज्ञान कितना उन्नत रहा होगा । ऊपर दिये गए उदाहरण संस्कृत ज्ञान के १ प्रतिशत हिस्से से भी कम है । ऐसे असंख्य उदाहरण हमारे प्राचीन भारतीय साहित्य तथा ज्ञान परंपरा मे भरे पड़े हैं परंतु अफसोस कि लोग सिर्फ कुछ स्मृतियों कि बातों को लेकर भारतीय समाज के विषय मे नकारात्मकता का प्रचार करते रहते हैं और इस साहित्य को ना ही पढ़ते हैं , ना ही प्रचारित करते हैं । किन्तु उपरोक्त उदाहरणो से हमारे पहले शोध प्रश्न का उत्तर अवश्य मिलता है की प्राचीन भारत मे वैज्ञानिक शिक्षा दी जाती थी तथा इसके उदाहरण के ग्रंथ भी उनके लेखकों के नामो के साथ आज भी मौजूद हैं |
भारतीय शिक्षण संस्थानो मे शूद्रों की स्थिति –
भारतीय शिक्षण संस्थानो मुख्यतः गुरुकुलों मे सभी वर्णो एवं जातियों के छात्र पढ़ा करते थे यह जानने के लिए इस शोध पत्र मे अंग्रेजों के ही द्वारा किए गए सर्वे के आंकड़ों का उपयोग किया गया है | Essential writings of Dharampal के पांचवे अध्याय मे धर्मपाल जी ने अंग्रेजों के शासन मे उन्ही के कलेक्टरों द्वारा करवाए गए सर्वे की रिपोर्ट साझा की है | यह रिपोर्ट 1822-25 के समय की है | इसमे मद्रास प्रेसीडेंसी की डाटा मे अंग्रेज़ स्वयं यह उल्लेख कर रहे हैं की कितनी संख्या मे किस वर्ण के छात्र उस समय के गुरुकुलों मे पढ़ रहे हैं |[7]
यहाँ Table – II मे छात्रों की संख्या तथा Table – III मे प्रतिशत के हिसाब से छात्रों की संख्या बताई गयी है | इसमे उड़िया, तेलगु, कन्नड, मलयालम, तमिल इन सभी भाषाओं को बोलने वाले क्षेत्रों से नमूने (samples) लिए गए थे । इसमे पढ़ने वाले छात्रों मे जहां 29,721 छात्र ब्राह्मण थे, 490 क्षत्रिय, 13,449 वैश्य और सबसे अधिक संख्या मे 75,943 शूद्र थे | यही नहीं 10,644 मुसलमान भी इन विद्यालयों मे पढ़ते थे |[8]
इसी तरह TABLE – III मे दिये गए प्रतिशत अनुसार कन्नड भाषी बेलारी के आंकड़े यदि देखे जाएँ तो जहां ब्राह्मण 18.01 प्रतिशत थे तो वहीं शूद्र छात्रों की संख्या का प्रतिशत 45.56 था | एक अकेला तेलगु भाषी क्षेत्र था जहां ब्राह्मणो की संख्या शूद्रों से अधिक नजर आती है किन्तु वहाँ भी 21 से 30 प्रतिशत तक शूद्र छात्र पढ़ते पाये गए थे |[9]


यह आंकड़े देखकर ही हमारे शोधपत्र के दूसरे शोध प्रश्न के उत्तर का अंदाजा लगाया जा सकता है की भारत की शिक्षा व्यवस्था मे शूद्रों के साथ भेदभाव नहीं था बल्कि ऊपर जो हमने आंकड़े देखे उसमे उड़िया, तेलगु, कन्नड, मलयालम, तमिल इन सभी भाषाओं को बोलने वाले क्षेत्रों मे से अधिकतर के विद्यालयों मे शूद्रों की संख्या ब्राह्मण छात्रों से अधिक थी | यही नहीं बंगाल और बिहार के विषय मे भी अंग्रेजों द्वारा सर्वे किया गया जिसका नाम था “Reports on the State of Education in Bengal1836 and 1838” (Adam’s Reports on Indigenous Education in Bengal and Bihar)[10] , इसमे एडम लिखते हैं की जहां भी उन्होने सर्वे किया वहाँ लगभग 30 अलग अलग जातियों के शिक्षक थे, इनमे से 6 शिक्षक तो चांडाल जाती के थे | धर्मपाल जी की पुस्तक ‘रमणीय वृक्ष’ के मुताबिक एडम भी अपने सर्वे मे यह बात कहता है की इनके सर्वे मे यह ज्ञात हुआ की ब्राह्मण और क्षत्रिय छात्रों की सभी स्कूलों मे कुल मिलकर संख्या 40% से अधिक नहीं थी तथा ज़्यादातर अन्य जाती के छात्र ही विध्यालयों मे पढ़ते थे | जैसे की वर्धमान जिले मे भारतीय विध्यालय मे डोम और चांडाल जाती के 61 छात्र थे जबकि इसी जिले मे मिशनरी स्कूल मे डोम और चांडाल जाती के मिलाकर भी कुल 4 ही छात्र अध्ययन करते थे| एडम के शब्दों मे निम्न जातियों के केवल 86 छात्र ही मिशनरी पाठशालाओं मे अध्ययन करते थे , इसकी अपेक्षा इस जाती के ही 674 छात्र भारत की परंपरागत शिक्षा देने वाली पाठशालाओं मे शिक्षा प्राप्त करते थे | इन आंकड़ों से यह प्रतीत होता है की शिक्षा के संबंध मे भारत मे शूद्रों के साथ भेदभाव नहीं किया जाता था |
निष्कर्ष / उपसंहार :
इस शोधपत्र की शुरुआत मे हम दो प्रश्नो को लेकर चले थे वह थे की – क्या भारत की शिक्षा व्यवस्था वैज्ञानिक थी ? एवं क्या भारत की शिक्षा व्यवस्था मे शूद्रों के साथ भेदभाव होता था ? प्राचीन संस्कृत की पुस्तकें, धर्मपाल जी के साहित्य एवं अंग्रेजों के सर्वे के अध्ययन के माध्यम से हमने पाया की प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था ना सिर्फ वैज्ञानिक थी बल्कि उसमे अलग अलग ऋषियों की पुस्तकों के माध्यम से गणित , ज्यामिती , भौतिकी जैसे जटिल विषय भी पढ़ाये जाते थे एवं इनपर शोध भी हुये हैं | इसी तरह अंग्रेजों के शिक्षा के ऊपर किए सर्वे की रिपोर्ट से हमे यह ज्ञात हुआ की भारतीय शिक्षा व्यवस्था मे भारत मे शूद्रों के साथ उतना भेदभाव नहीं किया जाता था जैसा की कई लोगों द्वारा बताया जाता है, बल्कि अधिक छात्र जो विद्यालयों मे पढ़ते थे वह शूद्र ही थे एवं शूद्र शिक्षक भी इन विध्यालयों मे नियुक्त होते थे | अतः हमारे दोनों ही शोध प्रश्न के प्राप्त उत्तरों से यह ज्ञात होता है की किसी भी विषय मे जन आंदोलनो के माध्यम से धारणा बनाने की अपेक्षा शोधपरक तथ्यात्मक उत्तर खोजने से ही सही निष्कर्ष प्राप्त होता है |
References
[1] Bharadwaaja, M. (2017). Vymaanika Shaastra: Or Science of Aeronautics. Vamzzz Publishing.
[2] Natya Shastra : Bharat Muni : Internet Archive. (2012, January 10). https://archive.org/details/NatyaShastra/natya_shastra_translation_volume_1_-_bharat_muni/.
[3] An English translation of the Sushruta samhita, based on original Sanskrit text. Edited and published by Kaviraj Kunja Lal Bhishagratna. With a full and comprehensive introd., translation of different readings, notes, comperative views, index, glossary and plates : Susruta : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive. (2008, March 26). Internet Archive. https://archive.org/details/englishtranslati00susruoft.
[4] सिद्धांत शिरोमणि ।१। : Kedardutt Joshi : Internet Archive. (1961). https://archive.org/details/20230304_20230304_1743.
[5] India’s glorious scientific tradition | exploration of ancient knowledge and modern insights | inspiring cultural pride, challenging assumptions and igniting curiosity in science and technology : Suresh Soni.
[6] The Editors of Encyclopaedia Britannica. (2024, March 18). Ashtadhyayi | Sanskrit Grammar, Panini’s text & 8 chapters. Encyclopedia Britannica. https://www.britannica.com/topic/Ashtadhyayi.
[7] Dharampal. (2015). Essential Writings of Dharampal.
[8] Page 213, Dharampal. (2015). Essential Writings of Dharampal.
[9] Page 214, Dharampal. (2015). Essential Writings of Dharampal.
[10] Amazon.in. (n.d.-b). https://www.amazon.in/BEAUTIFUL-TREE-DHARAMPAL/dp/8175310952.
Comments are closed.